રવિવાર, 26 ફેબ્રુઆરી, 2012


कहा अब नही आते, न आने से दिलको बुरा लगता है,
भले हो मशहुर गलीया,ये दिलका कुचा सुना लगता है,

जैसे भी दुरीया गर रखनी है तुजे, रखो मेरे हमनवाज,
मेरी हरएक सांसमे सिर्फ तेरा ही नाम गुंजता लगता है,

महसुस हमने भी किया है, ईन्तजार मे हर रातका रोना,
करवट बदलते रहते है बिस्तर भी कंटक सा लगता है,

अचानक उठ जाते है रात मे, सताता है अंधेरो का डर,
चीराग कि रोशनी में खुदका साया भी डरावना लगता है,

और तुम कहते हो, " हम नही आयेंगे,जाओ ", लेकिन,
जाए तो कहां?हर तरफ हर चहेरा हमे तुज जैसा लगता है ।

नीशीत जोशी

जीन्दगी बसर कर गये


जीन्दगी बसर कर गये मगर जीये नही,
हालत पे कभी अपनी भरोषा किये नही,

गुजर जाता रहा कारवा युहीं बे-मंजील,
राहोको कभी मंजीलका रास्ता दिये नही,

वोह जहर अगर देते तो पी भी लेते हम,
दुसरो के हाथो दिया अमृत भी पीये नही,

प्यार कि दास्तां सुनना अच्छा लगता था,
इसलिये प्यारके अल्फाज कभी सीये नही,

बदनाम न हो जाये कहीं जमाने के सामने,
अपनो के बीच कभी उनका नाम लिये नही।

नीशीत जोशी

બુધવાર, 22 ફેબ્રુઆરી, 2012

मकतूल थे हम


मकतूल थे हम, मकतल मेरा दिल बनाया,
कब्र पहोचाके उसने आंखो को झिल बनाया,

वाह रे उनकी महोब्बत ? उसको क्या कहेना,
जीने नही दिया,मरने को भी मुश्किल बनाया,

आलि माने थे पर दिये उसने आबेचश्म मुजे,
सीतम सहकर भी उसे हमने बिस्मिल बनाया,

चश्मेजाम पी के मखमूर बन अदम हो गये थे,
आशुफ्तः हो कर भी हमने उसे साहिल बनाया,

महोब्बत कि राह के वोह काहिल क्यों रह गये?
इनाम दे कर मुजे महोब्बत का जाहिल बनाया ।

नीशीत जोशी

મંગળવાર, 21 ફેબ્રુઆરી, 2012

नजर


तेरी नजर का ही कसूर था,
जीसे पाके मै तो मगरूर था,

घायल फिरते रहे गलीओमें,
जीस शहरमें मै मशहूर था,

ऐसी नजरोने कयामत ढायी,
पर प्यार वास्ते मजबूर था,

ना देखे तो सब बेजान लगे,
दिल का वही चश्मे-नूर था,

नजरे उठती लगता पैमाना,
उसे पीना प्यारका गुरुर था,

मदहोश हो गये नीगाहो से,
वो नशा उतरना तो दूर था ।

नीशीत जोशी

શનિવાર, 18 ફેબ્રુઆરી, 2012

बसे अन्जान शहरमें


अपनोको छोड बसे अन्जान शहरमें,
दोस्ताना तोड बसे अन्जान शहरमें,

खास बात भी नही कर पाए लोगोसे,
सपनोको जोड बसे अन्जान शहरमें,

अपनोकी कमी तो होती थी महेसूस,
बनाये कैसे मोड बसे अन्जान शहरमें,

हुन्नर जो था कहीं भी दिखा सकते थे,
न रास आयी दौड बसे अन्जान शहरमें,

दिल-ओ-जानसे चाहनेवाले वहां भी थे,
आये आयना तोड बसे अन्जान शहरमें ।

नीशीत जोशी

શુક્રવાર, 17 ફેબ્રુઆરી, 2012

कुछ तो कहो



कैसे बिताया है आपने आज? कुछ तो कहो,
क्या है आपकी खुशीका राझ? कुछ तो कहो,

मिलन कि आश थी पूरी करली होगी शायद,
पहन लिया क्या सर पे ताज? कुछ तो कहो,

थाम लेते थे सब का हाथ मासूक समज कर,
क्या न आये आप फिर बाज? कुछ तो कहो,

पूराने खतो को पढ के चूमा करते थे अक्सर,
क्या छोड दी आपने सब लाज? कुछ तो कहो,

महोब्बत के शहेनशाह बने हो पथ्थर के दौरमे,
क्या हुआ उसे भी आप पर नाज? कुछ तो कहो,

आयना भी देख कर शरमा जाता रहा है यूं तो,
क्या सजा रखे थे बहोत से साज? कुछ तो कहो,

अब न करो ज्यादा बेचैन इस दिल को तडपा के,
बया भी करो खुद छोड के हर काज, कुछ तो कहो ।

नीशीत जोशी