भूल तुझसे हुई मुझे समझने में,
बिना मापे गहरायी में उतरने में,
हर शक्श की तासीर है मुख्तलिफ़ मगर,
इक पल नहीं लगता उसे बहकने में,
झख्म नही दिखते दिल पर लगे हुए,
नाही वक्त लगता है दर्द को पनपने में,
लो, बहारे आ गई सहरा में गुल खिले,
क्यों देर करे है गुलशन, तू महकने में,
एक दिलजले के हाथ, मशाल क्या आई,
वक्त ना लगा जरा, बस्तिया उजड़ने में !
नीशीत जोशी 10.01.16
રવિવાર, 6 માર્ચ, 2016
भूल तुझसे हुई मुझे समझने में
भूल तुझसे हुई मुझे समझने में,
बिना मापे गहरायी में उतरने में,
हर शक्श की तासीर है मुख्तलिफ़ मगर,
इक पल नहीं लगता उसे बहकने में,
झख्म नही दिखते दिल पर लगे हुए,
नाही वक्त लगता है दर्द को पनपने में,
लो, बहारे आ गई सहरा में गुल खिले,
क्यों देर करे है गुलशन, तू महकने में,
एक दिलजले के हाथ, मशाल क्या आई,
वक्त ना लगा जरा, बस्तिया उजड़ने में !
नीशीत जोशी 10.01.16
मुसाफिर है,उनके शहर से हम चले जायेंगे
मुलाकात के नाम से, उसने मुहब्बत कर ली,
हमने, इश्क के नाम की, बस इबादत कर ली,
खयालों में खो कर हम, खुद से अजनबी हुए,
हमने, रातों की नींद से, रकाबत कर ली,
उन्ही के ओठों को, चूमने की ख्वाहिश जो रखी,
दिखा के जमाने को, उसने रवायत कर ली,
तमाशाई नही, जो हम कोई तमाशा करते रहे,
किरदार निभाने की, हमने शरारत कर ली,
मुसाफिर है,उनके शहर से हम चले जायेंगे,
इत्तिला दे, क्या उसने मिलने की जसारत कर ली?
नीशीत जोशी
(रकाबत-शत्रुता, जसारत-हिम्मत) 07.01.16
સાવ સાચી વાત છે
સગા સૌ નામના છે, સાવ સાચી વાત છે,
બધાએ સ્વાર્થના છે, સાવ સાચી વાત છે,
જવાની આવતા, રાજા બનેલાને કહો,
નકામી ધારણા છે, સાવ સાચી વાત છે,
કરે જે વેર બુદ્ધિથી, ઘમંડી જાણજો,
એ કોડી દામના છે, સાવ સાચી વાત છે,
વિચારો હોય મૌલિક, લખો દિલથી કવન,
શબદ સાધના છે, સાવ સાચી વાત છે,
છુપાવી કેમ શકશો,આંખ ચાડી ખાય જ્યાં,
નરી આ ભાવના છે, સાવ સાચી વાત છે.
નીશીત જોશી 05.01.16
बाँध सब्र का आज टूटने वाला है
बाँध सब्र का आज टूटने वाला है,
कोइ अपना मुझसे छूटने वाला है,
शाम वस्ल की हसीं हो जाती मेरी
चाँद खुद फलक को चूमने वाला है
वो मुलाकातें और बहेतर हो जाती
ख़ामोशी का आलम डूबने वाला है
परिंदें भी कफ़स तोड के उड जायेंगे,
पंख फैला अपने वो झूमने वाला है
तुम पिलाते रहना आँखो से जाम
ये रिंद यकीनन अं लूटने वाला है
जिस शहर के लोग नफ्स परस्त हो
प्यार का दरिया वहीं सूखने वाला है
राह ए मुहबत पर "नीर" चले भी कैसे ?
हिज्र ए गम का कांटा चूभने वाला है
नीशीत जोशी 'नीर' 02.01.16
तू ही है
मेरा जिगर मेरी जान तू ही है,
मेरी सुबह मेरी शाम तू ही है,
नही चाहीए तख्तो ताज़ मुझे,
मेरी शोहरत मेरा नाम तू ही है,
पीते है लोग मयखाने में बैठ के,
मेरी मयकशी मेरा जाम तू ही है,
रूठ जाओ तो मनाने पे मान जाना,
मेरी आन बान और शान तू ही है,
शरमाता है वो आइना भी अब तो,
मेरा आफताब मेरा चाँद तू ही है !
नीशीत जोशी 26.12.15
चला जाता है
एहसान मुझे जता के चला जाता है,
आशिके इश्क़ बना के चला जाता है,
अजब की फितरत है मेरे वो चांद की,
इक ही झलक दिखा के चला जाता है
कयामत तक साथ निभाने का वादा,
इतमीनान से बता के चला जाता है,
मुहब्बत में जब होता है हादसा,फिर,
वो दर्द सहना सिखा के चला जाता है,
अकेली यह रात भी करे तो करे क्या,
वह ख्वाब भी जगा के चला जाता है,
चलता रहा है 'नीर' तूफानों में अक्सर,
मगर तन्हा सफर डरा के चला जाता है !
नीशीत जोशी 'नीर' 23.12.15
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