आँसुओ की खातिर मुश्कुराना सिख लिया,
मुश्कराते देख उसने शरमाना सिख लिया,
बाते करने की इल्तजा को मान गए तुरंत,
गुफ्तगू करते उसने बहकाना सिख लिया,
हर रात उनके सपनों को लगे थे सजाने,
ख्वाब में आके उसने तडपाना सिख लिया,
सोचा,कभी तो बदलेगा मौसम आँखों का,
पर अदा से आँखों का बरसाना सिख लिया,
पीने की वो आदत तो पाल रखी थी हमने,
बिन पीये ही उसने लडखडाना सिख लिया |
नीशीत जोशी 15.06.13
શુક્રવાર, 21 જૂન, 2013
सिख लिया
आँसुओ की खातिर मुश्कुराना सिख लिया,
मुश्कराते देख उसने शरमाना सिख लिया,
बाते करने की इल्तजा को मान गए तुरंत,
गुफ्तगू करते उसने बहकाना सिख लिया,
हर रात उनके सपनों को लगे थे सजाने,
ख्वाब में आके उसने तडपाना सिख लिया,
सोचा,कभी तो बदलेगा मौसम आँखों का,
पर अदा से आँखों का बरसाना सिख लिया,
पीने की वो आदत तो पाल रखी थी हमने,
बिन पीये ही उसने लडखडाना सिख लिया |
नीशीत जोशी 15.06.13
શનિવાર, 15 જૂન, 2013
बदल जाते है
प्यार हो जाये तो मिजाज बदल जाते है,
हर गाने के सुर और साज बदल जाते है,
वोह जो करते है अपनी बुलंदी का गुरूर,
दिलबर को देखते आवाज़ बदल जाते है,
होने नहीं देते नाराज दिलबर को,क्योंकि,
रुसवा होने पर तख्तोताज बदल जाते है,
अदायगी से छुपाते है मुहोब्बत फिर भी,
खुद से छुपाते छुपाते राज़ बदल जाते है,
बेचैन खुद बने,मांगे चैन से सोने की दवा,
बिचारे तबीब के हर इलाज बदल जाते है |
नीशीत जोशी 14.06.13
पूरा समंदर पी गए
पूरा समंदर पी गए फिर भी प्यासे रह गये,
जिन्दगी जीने के बस सिर्फ बहाने रह गये,
अरमां तो था जीने का बहोत पर क्या करे,
शहर-ए-खामोशा अब मेरे ठिकाने रह गये,
आंसू की तरह निकला समंदर भी नमकीन,
मीठा होने की आश में हम किनारे रह गये,
हमसफ़र बन के साथ देना एक फ़साना रहा,
चले गये छोड़ के सब हमें,अफ़साने रह गये,
आयेगा कभी तो उजाला इन अंधेरो के बाद,
दिल को तस्सली देने सिर्फ दिलासे रह गये |
नीशीत जोशी
કવિઓ હૃદયે સીચેલા રુધિરે લખતા હોય છે
આકાશ ને જોનારા ધરા પર પડતા હોય છે,
દારુ ને પીનારા સડકો પર લથડતા હોય છે,
મારું તમારુંનાં શબ્દોથી પર જ રાખો સંબંધ,
સ્વાર્થી સ્વભાવે એ સંબંધો બગડતા હોય છે,
ટોચ પર પહોચવાની છે અપેક્ષા સૌને અહી,
ટકી રહેવા ટોચે એકબીજા ઝગડતા હોય છે,
શક્ય ન હોય તે, ખોટી વાતે રીઝાવે પ્રિયેને,
બહુ જુજ પ્રેમીઓ જ પ્રેમ માં મરતા હોય છે,
કોઈ પણ રચનામાં જીવ પુરાવો સહેલો નથી,
કવિઓ હૃદયે સીચેલા રુધિરે લખતા હોય છે .
નીશીત જોશી
રવિવાર, 9 જૂન, 2013
भरी महेफिल में हम तन्हा रह गये
भरी महेफिल में हम तन्हा रह गये,
खड़े थे वो किनारे और हम बह गये,
इल्तझा हमारी,चल दिए ठुकरा कर,
इन्तजार के हर लम्हे हम सह गये,
दास्ताँ मुहोब्बत की सुनके लगे रोने,
दर्द में अपने हर जख्म हम कह गये,
कमजोर रही होगी प्यार की इमारत,
एक एक करके सब वो पत्थर ढह गये,
आना न था तो वादा क्यों किया उसने,
कब्र तक इन्तजार करते हम रह गये |
नीशीत जोशी 08.06.13
नग्मे गा गा के रोये
एक मत्ला मैंने कही पढ़ा...और उसी मत्ले को लेकर...
कुछ लिखने की कोशिश की...
वोह मेरी दास्ता-ए- हसरत सुना सुना के रोये,
वोह मेरे आज़माने वाले मुझे आज़मा के रोये,
टूटे हुए एक खिलौनों की तरहा लेकर हाथो में,
वोह मेरे दिल को, आँखों से समंदर बहा के रोये,
मुहोब्बतकी फकीरी मेरी रास न आयी बादलोको,
बनके बारिस, ज़मी पे बुँदे टपका टपका के रोये,
बेदर्दी उन यादो ने किया ऐसा सितम पे सितम,
विरान रातो में वो सुर्क सपने सजा सजा के रोये,
अकेले थे तब जिन्दगी कट रही थी आसानी से,
अब मौत भी अपनी तन्हाई के नग्मे गा गा के रोये |
नीशीत जोशी 05.06.13
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